अयोध्या मुद्दे पर फैसला आने के कुछ दिन पहले से ही हर अखबार और चैनल पर "हिन्दू-मुसलमानों" को सहिष्णुता और धैर्य की घुटी पिलाई जा रही थी और इनका बखूबी साथ दे रहे थे हमारे ब्लॉग जगत के कई जाने माने महारथी; उनमे सब से आगे थे
सलीम खान (स्वच्छ सन्देश), शरीफ खान (हक़नमा), तौशिफ (दाबिर न्यूज़), सफत आलम तैमी, छदम इम्पैक्ट (शायद अनवर जमाल) और जयचंद नीरेंद्र नागर (एकला चलो रे), शेष नारायण (माफ़ कीजिये - अवशेष नारायण (विस्फोट) इत्यादि. इनलोगों ने बार-बार अपील की कि अदालत का फैसला चाहे कुछ भी आये, पर हमें इसका सम्मान करना चाहिए,
(शायद इसलिए कि ये सब इस मुगालते में थे कि केंद्र में हमारी सरकार है और फैसला हमारे कि हक में आएगा, और वहां सिर्फ "बाबरी मस्जिद" ही बनेगी).
मुझे बहुत अजीब सा लगा कि जो लोग बात बात पर हिन्दुओं पर तोहमत लगाते है वो लोग इतनी शिद्दत से देश में शांति कि अपील कैसे कर सकते है. खैर मन में एक सुकून था कि चलो इस मुद्दे पर तो ये लोग देश को बंटाना नहीं चाहते है, पर मैं गलत था, फैसला आने के 24 घंटे के अन्दर इन लोगों ने वही राग अलापना शुरू कर दिया जो पाकिस्तान हमेशा कश्मीर पर अलापता आया है. इन लोगों ने फैसले को एक तरफा करार दिया और बड़े बड़े लेख लिख डाले कि "फैसला में हिन्दू जीत गया पर हिन्दुस्तान और कानून हार गया". इस बार इन्होने अपने
जज न्यायमूर्ति एस क्यू खान को भी लपेटे में ले लिया.
इन महान पत्रकारों(?) ने अपना दोगला चरित्र अब दिखाना शुरू कर दिया, एक तरफ तो ये "सहिष्णुता" का मुखौटा ओढ़े हुए है, वही दूसरी तरफ हिन्दुओं और न्याय व्यवस्था को पानी पी पी कोस रहे है.
सलीम खान का दोगलापन तो मुझे अच्छे से मालूम था कि ये भेड़ का लबादा ओढ़े हुए भेडिया बोल रहा है पर अव-शेष नारायण भी अपने "सेक्युलर शोरूम" पर ताला लगने के डर से घबरा गए और इस फैसले को एक तरफा तक करार दे दिया.
नीरेंद्र नागर की भाजपा से जलन इस बात से साफ़-साफ़ झलकती है कि "भाजपा इस फैसले पर खुश नहीं है और भाजपा कि हार हो गयी". मुसलमानों के पक्षधर बनने वाले नीरेंद्र नागर ने शायद अब
"फेस रीडिंग पत्रकारिता" की नयी शुरुआत" कर दी है सलीम खान जो कल तक सहिष्णुता का भाषण झाड रह था आज उसने इस फैसले के खिलाफ नयी श्रंखला शुरू कर दी,
तो क्या ये "सहिष्णुता और धैर्य" का पालन करने का आदेश सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही था ??
कांग्रेस के मुखपत्र और बिकाऊ पत्रकारिता और पेड न्यूज़ में नए आयाम स्थापित कर चुके "नवभारत टाइम्स" ने एक लेख में लिखा "मुसलमानों के पक्ष में फैसला आने से कट्टरपंथी हिन्दू और भगवा ब्रिगेड द्वारा हिंसा फैलाये जाने की पूरी-पूरी सम्भावना है" मैं तो आज तक यही सुनाता आया था की हिन्दू सहिष्णु होते है और मुसलमान कट्टरपंथी होते है फिर ये नवभारत टाइम्स हिन्दुओं को किस बिनाह पर कट्टरपंथी और असहिष्णु घोषित करने में लगा है ये आप अच्छी तरह से समझ सकते है.
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नभाटा की वो खबर जिसमे हिन्दुओं को कट्टरपंथी बताया है
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अब कुछ सवाल -
जगजाहिर है की अयोध्या भगवान् श्री राम की जन्मभूमि है और वहां पर मंदिर था, ये बात न्यायलय मान चूका है, वहां जो 3 न्यायमूर्ती बैठे थे वो कानून के ज्ञाता थे, उन्होंने सुन्नी वक्फ बोर्ड की इस दलील को ख़ारिज कर दिया की वहां सिर्फ बाबरी मस्जिद ही थी और वो पूरी ज़मीन बाबरी मस्जिद को दे दी जाए. फिर भी माननीय जजों ने
"भारत के सांप्रदायिक सदभाव" को तरजीह देते हुए १/३ हिस्सा मुसलमानों के "दान" में दिया फिर भी हिन्दू सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं बोला, क्या ये हिन्दुओं के सहिष्णुता और धैर्य का प्रमाण नहीं है..??
जिस तरह से "हिन्दुओं" ने सहिष्णुता का परिचय देते हुए अपने विधाता श्री राम की ज़मीन का हिस्सा देना कबूल कर लिया, क्या कोई मुसलमान "
काबा, मक्का और मदीना" में एक इंच भी ज़मीन कोई मंदिर बनाने के लिए दे सकता है..??
जिस तरह से हिन्दु अपनी जीत पर सिर्फ "
सौहार्द और भाईचारे" के लिए अपनी ख़ुशी मनाने की बजाय शांति से अपने घर में रहे, क्या ये फैसला मुसलमानों के पक्ष में आता तो क्या वो मुसलमान जो "
पाकिस्तान की जीत पर जश्न मानते हुए पूरे शहर में पटाखे फोड़ते है" हिन्दुओं की भावनाओ का सम्मान करते...??
तो फिर किस बिनाह पर हिन्दुओं को "असहिष्णु और कट्टरपंथी" कहा जा रहा है..???
फिर क्यों ये अपने आप को पत्रकार समझने वाले ब्लॉगर गिरगिट की तरह रंग बदल रहे है..???